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पूरा मकान भांय-भांय कर रहा था। सुंदरी का कोई पता नहीं था। घोष बाबू परेशान थे। यह सुंदरी भी कभी-कभी बहुत तंग करती थी। उसकी हर ज़रूरत का ध्यान रखते थे घोष बाबू लेकिन फिर भी कभी कभी गच्चा दे जाती थी। सुंदरी के बिना तो पूरा मकान ही सूना लगता था और फिर घोष बाबू के लिए समय काटना मुश्किल हो जाता था। आज दोपहर से ही गायब थी। और अब रात के आठ बजने जा रहे थे। घोष बाबू चिंतित भी थे और गुस्सा भी। चिंतित कि कहीं उसे कुछ हो न गया हो। गुस्सा कि इस तरह गायब होने की ज़रूरत क्या है? वह अक्सर इसी तरह बीच-बीच में गायब हो जाती थी और फिर वापस आ जाती थी। अगर इस बार ऐसा हुआ तो उसे वह घर में नहीं घुसने देंगे। फसला पक्का हो गया था। आज सारी रात उसे घर के बाहर ही गुजारनी होगी। खाना भी नहीं मिलेगा। उसके लिए तली गई मछली उन्होंने फिज में रख दी । मुख्य दरवाजा बन्द कर दिया। सारी खिड़कियां बंद करने लगे लेकिन उस खिड़की तक पहुंचते-पहुंचते उनके हाथ अचानक थम गये, जिसका इस्तेमाल सुंदरी सबसे ज्यादा करती थी। रात भर बाहर रहने में उसे काफी तकलीफ होगी। इतनी बड़ी सजा उसे नहीं मिलनी चाहिए। हां, ड़ांट पिला देंगे लेकिन बिना खाये पिये रात भर घर के बाहर—नहीं!नहीं !! यह बहुत बड़ी सजा हो जायेगी। उन्होंने खिड़की खुली छोड़ दी। पलंग पर आ कर बैठ गये। गुस्से में इतना काम करते-करते वे बुरी तरह थक गये थे। उन्हें इस तरह भाग-दौड़ करनी भी नहीं चाहिए थी। सत्तर साल की उम्र, ऊपर से दिल के मरीज। वे लेट गये। गठिया की वजह से ठीक से चला भी नहीं जाता था। घुटने बग़ावत कर देते थे लेकिन फिर भी घोष बाबू अभी चल रहे थे, सक्रिय थे।
लेटे-लेटे उनकी नज़र सामने की दीवार पर टंगी कमला की तस्वीर पर चली गई। हंसता हुआ जीवंत चेहरा। अगर आज वह होती तो उनके थक कर लेटने पर परेशान हो जातीलेकिन आज उनके लिए परेशान होने वाला कोई नहीं है। सुंदरी होती तो वह भी पास आकर लेट जाती। वह और कुछ कर पाये या नहीं अच्छा साथ ज़रूर निभाती है। उससे भी बल मिलता है। आशीष को गये छह महीने से ज्यादा हो गये थे। आशीष रहता तो नन्ही नातिन उन्हें घेरे रहती। उनकी परेशानी से वह सबसे ज्यादा परेशान होती थी। दादू-दादू करते हुए आगे पीछे। कभी-कभी इसके लिए भी उसे अपनी मां से डांट खानी पड़ती थी। और उस दिन तो हद हो गई जिस दिन सात साल की नन्ही के गाल पर उसके मां की पांचों अंगुलियां इसलिए छप गईं कि वह उनके पास से हटने का नाम ही नहीं ले रही थी। उस दिन उन्हें गुस्सा कम पीड़ा ज्यादा हुई थी। क्या इसी दिन के लिए लोग बेटा-बहू-नाति-पोते के सपने देखते हैं? इतने हसीन सपने का इतना डरावना सच ! लेकिन अब वे मुक्त हैं। आशीष ने उन्हें रोज-रोज के तनाव से बचा लिया । अलग फ्लैट खरीद कर चला गया। लगभग बीस किलोमीटर दूर। पुश्तैनी मकान में अब कोई तनाव नहीं। अब वे मुक्त हैं। अपनी ज़िंदगी है , अपनी मर्जी है, अपनी पेंशन है। सबकुछ ठीकठाक है लेकिन कभी-कभी मकान में पसरा सन्नाटा बहुत ही डरावना लगने लगता है।
दीवार घड़ी ने नौ बजने का संकेत दिया। यह उनके रात के भोजन का समय है लेकिन बिना सुंदरी के भोजन? इस बात की कल्पना से ही उन्हें सिहरन होती थी। घर खाली होने के बाद से ही सुंदरी उनकी ज़िंदगी बन चुकी थी। चौबीसों घंटे की ज़रूरत थी सुंदरी। बिना सुंदरी के उनका कोई काम नहीं होता थाऔर वही सुंदरी आज दोपहर से गायब थी। कहीं कोई पता नहीं था। एक बार सोचा ढूढने निकलें लेकिन इतनी रात को गठिया वाले घुटनों को लेकर उसे कहां खोजेंगे? चुपचाप इंतजार करना ही बेहतर सोचा। आज खाने के कार्यक्रम में थोड़ा विलंब होगा। मासी (काम करने वाली महरी) खाना बना कर कब की जा चुकी थी। आज सुंदरी के लिए इंतजार करेंगे। खाने का कार्यक्रम कम से कम दस बजे तक के लिए स्थगित कर दिया उन्होंने।
आशीष के जाने के बाद घर बिल्कुल सूना हो गया था। दिन नहीं कट रहे थे। ज़िंदगी में कोई तनाव नहीं था लेकिन था अकेलापन, पीड़ा, दुख। कमला की तस्वीर ने तब उनका बहुत साथ दिया था। मानो हर वक्त संवाद होता रहता था। चार दिन बाद अचानक सुंदरी उनकी ज़िंदगी में आई थी। और फिर उस दिन से वहीं की हो कर रह गई थी वह। सुंदरी को लेकर वे फिर जी उठे। उठते-बैठते-खाते-पीते बस सुंदरी। अब सुंदरी के लिए वे सप्ताह में कम से कम तीन दिन बाज़ार ज़रूर जाते क्योंकि बिना मछली के सुंदरी को खाना हज़म ही नहीं होता था। दोस्त-साथी तो चकित रह जाते थे। कहते थे—घोष बाबू, पहले तो आप इतना बाज़ार नहीं जाते थे लेकिन अब हर दूसरे दिन बाज़ार। घोष बाबू कहते—अरे, स्वस्थ रहता तो रोज जाता। सुंदरी को ताजा मछली पसंद है लेकिन क्या करूं शरीर इजाजत नहीं देता। इसलिए बेचारी को फिज में रखी मछली से काम चलाना पड़ता है। सुंदरी का रूटिन फिक्स था। सुबह ठीक आठ बजे–घोष बाबू चाय पीते थे और सुंदरी दूध। उन दोनों के नाश्ते की व्यवस्था मासी करती थी। मासी सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक उनके पास रहती थी और इस दौरान सारा काम निपटा कर जाती थी। दोनों वक्त का खाना भी वही बनाती थी। बारह बजे एक तली हुई मछली। घोष बाबू के लिए फिर से चाय। चाय के बहुत शौकीन थे वे। अब तो खैर चाय ज़िंदगी का हिस्सा बन गई थी। वे कहते भी—वह बंगाली ही क्या, जो चाय नहीं पीता हो। चाय नहीं पीने वाला व्यक्ति और चाहे जो भी हो लेकिन बंगाली नहीं हो सकता। दोपहर का खाना ढाई बजेतक फिर थोड़ा आराम। शाम साढ़े चार बजे घोष बाबू इवनिंग वाक के लिए निकल जाते। मॉर्निंग वाक उन्होंने बंद कर दिया था। पहले सुबह चार बजे ही मॉर्निंग वाक पर निकल जायाकरते थे। एक बार बेहोश होकर गिर पड़े थे।दिल का हल्का सा दौरा था। लगभग आधे घंटे तक सड़क पर पड़े रहे। उतनी सुबह बाहर कौन मिलता, जो उन्हें अस्पताल तक ले जाता। बाल-बाल बच गये थे। तब से मॉर्निंग वाक बंद कर दिया था। शाम को भीड़भाड़ में निकलते थे। अगर रास्ते में कुछ हो भी गया तो लोग उन्हें संभालेंगे तो सही। घुटनों की वजह से ज्यादा चल नहीं पाते थे। पास के मैदान में जाकर थोड़ा टहलते, फिर मैदान में ही बैठ कर सुस्ता लेते। साथ ही शाम की ताजा हवा का आनंद भी उठा लेते। इस दौरान सुंदरी उनके साथ रहती। कई लोगों ने तो मजाक भी किया-लगता है घोषबाबू का ध्यान रखने के लिए बौदी (भाभी) सुंदरी का रूप लेकर आ गई है। घोष बाबू इन बातोंपर ध्यान नहीं देते। हंस कर उड़ा देते। शाम छह बजे तक सुंदरी के साथ वे घर वापस लौट आते। मासी चाय बनाकर देती। सुंदरी दूध पीती। चाय की चुस्की के साथ घोष बाबू दिन भर का समाचार जानने के लिए टेलीविज़न से चिपक जाते। आठ नौ बजे तक टेलीविज़न चलता। फिर खाकर सोने की बारी लेकिन आज रूटिन पूरी तरह बिगड़ गई थी। टेलीविज़न तो सात बजे ही बंद हो गया। सुंदरी के नहीं आने से रात नौ बजे खाने का कार्यक्रम भी कैंसिल हो गया। हर पल तनाव जी रहे थे घोष बाबू।
ऐसा तनाव इससे पहले एक बार ही झेला था उन्होंने। आशीष तब छठीं कक्षा का छात्र था। शाम को सात बजे जब वे दफ्तर से घर लौटे थे तो कमला को बिलखते हुए पाया था। —क्या हुआ? पता चला आशीष अभी तक स्कूल से नहीं लौटा है। वे भी सन्न रह गये। साढ़े चार बजे तक स्कूल से लौट आने की बात थी लेकिन शाम सात बजे तक नहीं लौटा? कमला उसके सभी साथियों से पूछताछ करचुकी थी। सभी घर लौट चुके थे और किसी को भी आशीष के बारे में जानकारी नहीं थी। सबसे चौंकाने वाली बात तो अमल ने बताई थी कि वह लंच ऑवर के बाद से ही गायब है। अर्थात सेकेंड हॉफ में वह स्कूल में नहीं था। आस पड़ोस के कई लोग घर में आ गये थे। सभी सांत्वना दे रहे थे—अपनी बुआ के यहां चला गया होगा, अपने चाचा के यहां चला गया होगा, टयूशन पढ़ने गया होगा,किसी दोस्त के यहां गया होगा लेकिन घोष बाबू का मन तो किसी अशुभ बात के अलावा और कुछ सोच ही नहीं पा रहा था। अपहरण की घटनाएं काफी बढ़ गई थीं। कहीं किसी ने उसे अगवा तो नहीं कर लिया लेकिन उनकी माली हालत इतनी अच्छी नहीं थी कि कोई फिरौती के लालच में उनके बेटे का अपहरण करता। थोड़ा शकुन मिला। उन्हें विश्वास था कि किसी ने उसका अपहरण नहीं किया होगा। फिर? कहीं किसी सड़क दुर्घटना में……….? नहीं, नहीं ऐसा नहीं हो सकता। कमला के बार-बार मना करने के बावजूद उन्होंने आशीष के लिए साइकिल खरीद ली थी। आशीष काफी खुश हुआ था साइकिल पाकर और घोष बाबू को रोज-रोज के बस भाड़े से राहत मिली थी। अब वह साइकिल से ही स्कूल जाता था। एक के बाद एक अनिष्ट आशंकाएं मन में आ रही थीं। किसी ने थाने जाकर रिपोर्ट लिखाने की सलाह दी। पता नहीं क्यों इस सलाह पर घोषबाबू के हाथ-पांव ठंडे पड़ गये थे। थाने का नाम आते ही उन्हें लगा कि कोई बहुत बड़ा अनिष्ट हो गया हो।उनका मन नहीं माना। तय हुआ कि पहले सारे रिश्तेदारों के यहां ढूंढ लिया जाय। घोषबाबू अपनी बहन के यहां निकल गये, पास-पड़ोस के एक दो लोग उनके साथ हो लिये। एक दो लोग दूसरे रिश्तेदारों के यहां चले गये। कमला घर में रोती रही। कमला के लिए वक्त काटना मुश्किल हो गया था। तनाव का वक्त काटे नहीं कटता। आज वक्त भारी पड़ रहा था।
आशीष मिला था। अपनी बुआ के यहां। स्कूल से सीधे बुआ के यहां चला गया था लेकिन बुआ से यह नहीं बताया था कि उसके यहां आने की सूचना घरवालों को नहीं है। इसलिए बुआ निश्चिंत थीं। पहले भी वह बुआ के पास आकर एक दो दिन रह कर जाता था। तब रात के दस बज रहे थे। घोष बाबू को देख कर आशीष सकते में आ गया था। उसे लगा अब पिटाई होगी। वह जाकर बुआ के पीछे छिप गया। बुआ भी माजरा समझ गई लेकिन घोष बाबू को गुस्सा नहीं आया। वह रो पड़े। उन्होंने आशीष को सीने से चिपटा लिया। उस रात तो मानो कमला और घोष बाबू को नया जीवन मिला था। अब आशीष बड़ा हो गया है। बाप बन गया है। अब वह छठवीं कक्षा का आशीष नहीं है। इसलिए उसे देखे महीनों गुजर जाते हैं लेकिन घोष बाबू को वह तड़प महसूस नहीं होती, जो उस रात हुई थी। याद आती है, आंखों में आंसू भी आते हैं लेकिन वह तड़प। क्या बेटे जब बड़े हो जाते हैं तो बाप-बेटे के सम्बन्ध की संवेदनशीलता खत्म हो जाती है? क्या इसी दिन के लिए बेटे की मन्नतें मांगते हैं लोग? क्या इसी दिन के लिए लोग बेटा पैदा होने पर जश्न मनाते हैं? मिठाइयां बांटते हैं? क्या ….? क्या ….?? क्या….??? कितने क्या लेकिन किसी भी कया का जवाब नहीं। कभी-कभी क्या के चक्रव्यूह में बुरी तरह फस जाते थे घोष बाबू और तब उन्हें लगता कि चाहें वे लाख नकारे लेकिन वह तड़प आज भी है और शायद जब तक शरीर में सांस है, तब तक वह तड़प रहेगी। क्या आशीष के मन में भी उनके लिए ऐसी तड़प आती होगी? क्या वह कभी यह सोच कर दुखी होता होगा कि पापा अकेले हैं? क्या यह सोचकर वह परेशान होता होगा कि अगर पापा को कुछ हो गया तो कौन संभालेगा उन्हें? अकेले पापा और दिल की बीमारी? क्या वह परेशान होता होगा? शायद नहीं। अगर परेशान होता तो कम से कम दस दिन में एक बार ही सही ख़बर तो लेता। यहां तो महीनों बीत जाते हैं। तीन महीना पहले आया था वह। उसके बाद से कोई ख़बर नहीं। उन्होंने सर झटक दिया। बीमारी से उन्हें डर नहीं था। बीमारी उन्हें अच्छी लगती है। कम से कम कोई चीज तो है, जो उनका साथ कभी नहीं छोड़ती। ऐसी बीमारी से क्या डरना? क्यों परेशान होना? बेटे से तो अच्छा बीमारी है। बेटे ने साथ छोड़ दिया, बीमारी ने नहीं । सुंदरी ने भी अच्छा साथ निभाया था लेकिन आज? कहां चली गई वह? घबराहट होने लगी। ज्यादा परेशान होना, ज्यादा सोचना मना था उनके लिए लेकिन आज सुंदरी ने तो परेशान किया ही, पिछले जीवन के तनावों में ढकेल दिया था। सीने में हल्का दर्द होने लगा था। वह समझ रहे थे। दिल का दौरा पड़ सकता है। पसीना भी आने लगा था। वे घबड़ा गये। घर में अकेले थे। इससे पहले कि कुछ हो तत्काल दवा लेनी ज़रूरी है। वे बिस्तर से उठे लेकिन पांव झनझना रहा था। बहुत देर तक एक ही करवट सोने की वजह से कोई नस दब गई होगी। चल नहीं पाये। वहीं लड़खड़ा कर बैठ गये। तकलीफ बढ़ गई। दवा टेबल पर रखी थी। लगभग रेंगते हुए वे टेबल तक पहुंचे। सार्बिटेट लिया और जीभ के नीचे दबा लिया। वहीं फर्श पर ही लेट गये। आंखें बंद कर ली। पसीने से लथपथ हो रहे थे। ऐसे मौकों पर अकेलापन खलता था। हालांकि घोष बाबू कभी भी सार्वजनिक रूप से यह मानने को तैयार नहीं थे कि बेटे-बहू के जाने से वे अकेले हो गये हैं। पिछले दिनों गये थे एक विवाह समारोह में. पुराने दोस्तों की महफिल जमी हुई थी। किसी ने कह दिया–घोष दा, आजकल तो बहुत अकेले हो गये हैं आप?
तत्काल विरोध किया था घोष बाबू ने–अकेला? नहीं तो। किसने कह दिया आपको?
—आशीष तो चला गया न आपको छोड़कर?
— छोड़कर गया कहना सही नहीं होगा। अपना फ्लैट खरीद लिया। कितना दिन खाली रखेगा। और मुझे तो तुम जानते ही हो। अपना जन्म स्थान छोड़कर मैं नहीं जा सकता लेकिन मैं अकेला नहीं हूं।
और फिर शुरू हो गया सुंदरी का बखान। ऐसा करती है, वैसा करती है। हमेशा मेरे साथ रहती है। यह खाती है, वह खाती है, सुबह गोद में नहीं लूं तो नाराज़ हो जाती है। पास नहीं फटकती है। मनाना पड़ता है। तबीयत खराब हो तो छोड़कर कहीं नहीं जाती। पास बैठी रहती है। हर पीड़ा, हर दुख समझती है। इतना अच्छा साथ सिफ सुंदरी ही दे सकती है और कोई नहीं। सुंदरी का बखान एक बार शुरू हुआ तो फिर दूसरे किसी विषय पर बात नहीं हो सकती थी। बस सुंदरी और सुंदरी। हक़ीकत यह थी कि जब से सुंदरी उनके जीवन में आई थी, घोषबाबू का सबसे प्रिय विषय वही थी।कोई महफिल हो, कोई आयोजन हो—चार लोगों के बीच बैठते किसी न किसी बहाने घोष बाबू के जबान पर सुंदरी का नाम आ ही जाता और फिर शुरू हो जाता सुंदरी का गुणगान। अब पीठ पीछे तो लोग मजाक भी उड़ाने लगे थे। खुद आशीष भी सुंदरी को लेकर मजाक करने से नहीं चूकता। घोष बाबू को सब पता था लेकिन उन्हें किसी की परवाह नहीं थी। उम्र के इस पड़ाव पर वे किसी की परवाह करना भी नहीं चाहते थे। अपने हिस्से की थोड़ी सी ज़िंदगी अपने ढंग से जी लेना चाहते थे। अब तक की तो ज़िंदगी उनकी अपनी ज़िंदगी रही नही। गरीबी की वजह से बचपन का हिस्सा मां-बाप घर को देखने में गया। जवानी बेटे में गया। अब बुढ़ापा अपना है। अपने ढंग से जीना है। वैसे भी बूढ़ों की ज़रूरत इस समाज में किसी को है भी नहीं लेकिन घोष बाबू समाज की आंखों में अंगुली डालकर यह दिखा देना चाहते थे कि बूढ़े बोझ नहीं। वे अभी भी बोझ उटा सकते हैं। अपनी ज़िंदगी खुद जी सकते हैं। बस सुंदरी जैसी किसी साथी का साथ चाहिए। निस्वार्थ साथ।
घोष बाबू अब राहत महसूस कर रहे थे। सॉर्बिटेट ने अपना काम किया था लेकिन साइड अफेक्ट की वजह से सिर भारी हो गया था। सिर दर्द वे झेल जाते थे। साइनस के मरीज थे। अक्सर जब वे दफ्तर से लौटते, साइनस का दर्द उनके साथ आता था। कमला परेशान हो जाती थी। सिर पर बाम लगाती थी। चाय बना कर देती थी। सारे जतन करती। कभी-कभी घोष बाबू मजाक में कहते भी थे कि यह साइनस मुझे बहुत प्यारा है। कम से कम इसी बहाने तुम ज्यादा से ज्यादा वक्त तक मेरे करीब तो रहती हो। घोष बाबू को साइनस से प्यार हो गया था। साइनस के दर्द को वे सीधे कमला के प्यार से जोड़ कर देखते थे लेकिन अब कमला नहीं है। अब साइनस भी नहीं है। कमला के जाने के बाद बड़ी बड़ी बीमारियों का हमला हुआ तो पता नहीं साइनस दुम दबा कर कहां भाग गया। घोष बाबू ने इसे अच्छा ही माना वरना वे साइनस के दर्द से कम कमला की कमी से ज्यादा परेशान होते।
घड़ी ने बारह की घंटी बजाई। मकान की सारी बत्तियां जल रही थीं। रोशनी से पूरी तरह नहा रहे मकान में घोष बाबू को अंधेरा ही अंधेरा नज़र आ रहा था। शायद इतना अकेलापन उस दिन भी महसूस नहीं हुआ था, जिस दिन आशीष घर छोड़ कर गया था। याद आ गया वो दिन, जिस दिन कमला आखिरी विदाई ले रही थी। श्मशान से लौटने के बाद घोष बाबू ने अपने अन्दर के सन्नाटे और अकेलेपन को महसूस किया था। घर में रिश्तेदारों की भीड़ थी लेकिन उस दिन घोष बाबू अकेले थे। यह अकेलापन दूर नहीं हुआ। आज भी वह अकेलापन उन्हें डराता है। सुन्दरी ने थोड़ा साथ निभा दिया था लेकिन आज वह भी नहीं थी। बुढ़ापे की आखिरी विश्वसनीय साथी। अन्दर का अकेलापन और डरावना लगने लगा । कितनी हसरत से यह घर बनाया था घोषबाबू ने लेकिन आज यह सिफ मकान है। चार दीवारों से घिरा, छत से ढंका एक मकान। घर तो कमला अपने साथ लेकर चली गई थी। घोष बाबू ने कोशिश की थी कि घर घर बना रहे लेकिन थोड़ा बहुत जो घर बचा हुआ था, उसे आशीष नन्हीं के साथ लेता गया था। घोष बाबू उठ कर खड़े हुए। शरीर उठने की इजाजत नहीं दे रहा था। ऐसे मौकों पर कमजोरी शरीर पर हावी हो जाती थी। बेवजह बत्तियों का जलना घोष बाबू को कभी भी पंसद नहीं रहा। इसे लेकर कई बार आशीष-बहू से चखचख हो चुकी है लेकिन पुरानी आदत से मजबूर। आज बीमारी की इस हालत में भी उन्हें बत्तियों का बेवजह जलना नागवार गुजरा।
थोड़ी ही देर में मकान में अंधेरा था। सिफ उनके कमरे की बत्ती जल रही थी। खाने का कार्यक्रम अब रद्द हो चुका था। भूख मर चुकी थी। नींद का दूर-दूर तक नामो-निशान नहीं था। दूर-दूर तक सुंदरी का भी कोई नामो निशान नहीं था। अब दिमाग सोचने की हालत में नहीं था। जब अपना बेटा अपना नहीं हुआ तो वे सुंदरी के लिए इतना परेशान क्यों हो रहे हैं? उन्होंने खुद को
समझाने की कोशिश की। थोड़ी तसल्ली मिली लेकिन फिर थोड़ी देर बाद घूम फिर कर वहीं चिन्ता, वही परेशानी। क्यों न किसी की मदद ली जाय? किसे फोन करें? आशीष को फोन कर फायदा नहीं। एक तो इतनी रात वह उतनी दूर से आयेगा नहीं और ऊपर से नाराज भी होगा। किसे फोन करें? अब अफसोस हो रहा था। पहले ही किसी को फोन कर सुंदरी को ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए थी लेकिन रात के साढ़े बारह बजे किसे फोन करें। किसी को फोन करने का इरादा छोड़ दिया। नहीं अब किसी पर इस तरह निर्भर नहीं होना है। अपनी जिंदगी है, अकेले चैन से जीना चाहिए। सुंदरी के चक्कर में एक दिन की जिंदगी बर्बाद हो गई थी। वे लेट गये। नहीं आज से वे अकेले हैं। अकेले जियेंगे। उन्होंने जोर से आंखें बंद कर ली। सोने की कोशिश करने लगे। लेकिन आंखें बंद करते ही सुंदरी ज्यादा प्रबल रूप से उनकी आंखों के सामने आ गई। उन्होंने और जोर से आंखें बंद करने की कोशिश की। सुंदरी और साफ़ नजर आने लगी। उन्होंने घबराकर आंखें खोल ली। ये सुंदरी उनका पीछा क्यों नहीं छोड़ रही है? तभी आवाज आई–म्याऊं, म्याऊं……. वे तंग आ गये। अब कान भी धोखा देने लगे? लेकिन नहीं… फिर आवाज आई–म्याऊं…..म्याऊं……..इसका मतलब है सुंदरी आ गई थी। घोषबाबू तेजी से दरवाजे की ओर बढ़े उसके स्वागत के लिए।
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Once you have optimized your site for search engines, your next step would be to submit it to the search engines and web directories, so that your site is indexed by search engines and visited by many. Are you confused with search engines and directories?, you are not alone; most people do!. Lets see what we can do to clear your confusion …
Search Engines and Directories – How they differ?
A search engine is a system that enables users to search and retrieve information from the web. Usually, search engines use a software program, generally referred to as crawlers, to index web pages. Various search engines use complex algorithms to index and categorize the web pages. On the other hand, web directories contain a collection of web pages organized into categories and sub-categories. The main difference between directories and search engine is that search engines use software to automatically index the web pages; whereas in a directory, web sites are organized into categories by people.
Why submit in directories?
If you have submitted to at least one directory and have ever checked the traffic to your site from web directories, you would have noticed that it is negligible comparing to the traffic coming through search engines. This fact prompts you to ask, “Is it worth submitting my site in directories?”. Before answering that, lets analyze the benefits of listing in directories…
First, directories bring targeted traffic. Though the traffic generated through directories is very limited, this traffic is from people who, by their own choice, come to our site by browsing through categories in the directories. These people are more likely to remain in our site for long and more likely to be our prospects. Another important benefit is that these directories are considered “expert” sites by search engines. So, submitting a site in directories increases its chance of getting good rank in search results. Isn’t it worth submitting your site in directories?
Why submit in directories?
Directories can broadly be classified into “Free Directories” and “Paid Directories”. There are many free directories available on the web, such as DMOZ, Yahoo!, World Wide Index, AbiLogic, Gimpsy, JoeAnt, etc. Usually the free directories take a long time to list a submitted web site. So be patient and constantly check these directories for your site. The paid directories list a submitted site usually within a day! If you go for the paid option, you can consider the following directories: Arielis, BOTW, BlueFind, Microsoft bCentral, and GoGuides.
• Make sure your site has no broken links, no broken images, no missing pages, no typos. Have a thorough review of your site.
• In the description field of the submission form, provide a readable sentence. That is, do not stuff this field with keywords, because the editor will find it and reject your site. Similarly, avoid marketing language such as “the best”, “Most powerful”, etc. because the editor will edit the sentence which may result in removal of your genuine keywords.
• Be careful in selecting a suitable category in the directory. If you do not find a fitting category for your site, check the category where your competitor sites are listed and submit your site there.
• Constantly check whether your site is listed in the directory. Free directories take a bit long to list a site
Conclusion
There is no doubt that search engines consider directories as reliable sources of reference. So, link popularity of the sites listed in directories increases manifold, making them to appear on top results. After all, our main objective in web site optimization is increasing our rank in search engines, and submitting in directories is one of those good practices that would ensure a better position in search engines.
Call Gatesix today and find out how our search engine submission services can help your site remain highly visible.
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Theke pe Yun Na Chhoro Mujhe ,
Ghar Laut Ke Bhi Aa Naa Paoon Main Maa…
Paua lene Bhej Na Itna Door Mujko Tu,
Ghar bhi bhool jaun main Maa…
Kya Itna Bura Hoon Main Maa…
Kya Itna Bura Hoon Main…Meri Maa..
Scotch main ,itna peeta nahi,
Peg Se Seham Jaata Hoon Main Maa
Chehre Pe Aane Deta Nahin
Lekin kabhi ludak jaata Hoon Main Maa
Tujhe Sab Hai Pata…Hai Naa Maa
Tujhe Sab Hai Pata, Meri Maa …
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Google has released a new version of its search appliance for businesses with enhanced end-user features such as personalized alerts and results ranking। Google has updated its network search hardware offering.
The new version of the Google Search GB-7007 is a hardware-and-software bundle integrates storage hardware from Dell and features a self-contained search system for managing an organization’s internal electronic files. It has the ability to index and search through some 10 million documents. The box is designed to allow enterprise users to search for company documents in a similar method to that of Google’s web search engine. The new version is available in five-box and 12-box rack versions.
Google’s lead product manager for enterprise search wrote in a blog posting “We think that searching for the myriad of business information that helps you do your job should be as easy as searching for information on Google.com, regardless of how much content your organization has, or where it resides”.
Google said it offers an alerts system that enables employees to receive emails when a new document related to topics they are interested is entered. It also allows administrators to bias results based on metadata, such as author, date of creation, department, or job function.
In addition to the larger capacity, the company said that it has increased performance speed as well as added security features and improved the quality of results. The appliance allows administrators to manage data in 27 languages and deliver search results in 40 languages. The device, which comes in a yellow rack-mount unit, is designed to replace several indexing and database servers.
Prices start at $30,000 for an entry-level version that can index 500,000 documents, and includes two years of support, hardware replacement coverage, and software updates.
Story Source : Google.com
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